चाँदनी जो रात थी....





दो बज चुके थे ,
सब सो चुके थे ।


मैं निकली दबे पाँव थी ,
किसी से मिलने को बेकरार थी ।


चाँदनी रात में चाँद से ,
मुलाकात जो खास थी ।


चाँद - तारों से आसमां था रौशन , 
हरियाली से सजा था मेरा आसन ।


बस इसी सूकुन की तलाश थी ,
दुनिया के शोर से जो पार थी ।


मन्द पवन का झोंका ,
फिर किताबें दो - चार थी ।


ऐसी जो रात थी ,
बस उसी से मिलने को बेकरार थी ।


- विनीता

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