दो बज चुके थे ,
सब सो चुके थे ।
मैं निकली दबे पाँव थी ,
किसी से मिलने को बेकरार थी ।
चाँदनी रात में चाँद से ,
मुलाकात जो खास थी ।
चाँद - तारों से आसमां था रौशन ,
हरियाली से सजा था मेरा आसन ।
बस इसी सूकुन की तलाश थी ,
दुनिया के शोर से जो पार थी ।
मन्द पवन का झोंका ,
फिर किताबें दो - चार थी ।
ऐसी जो रात थी ,
बस उसी से मिलने को बेकरार थी ।
- विनीता
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